Tuesday, October 4, 2011

ये कैसी जुस्तजू



जब छोटे थे तो ही अच्‍छा था
ये ख्वाबों की दुनिया,
उन आसमाओं की दुनिया
जो अधूरे हैं और जलते हैं सीने में

काश कभी देख मैं पाता
उन मंज़िलों के पार भी क्या होता
शायद इतने ना मुश्किल फ़ैसले होते
और राहें हद आसां ही होती

एक अक्स मिट के खाक हुआ था,
एक नया पैदा हुआ
कुछ बेगानी सी सूरत थी उसकी,
कुछ शैतानी फ़ितरत
पर फिर मैं संभल ना पाया
खो गया उसके आगोश में

आँसू बड़े पराए निकले
और हंसा मैं ऐसे
जैसे उन दुनिया वालों को बता रहा हूँ...
रूठ गए कल के सवेरे,
कोई पास ना आए मेरे

अब और धुआँ बढ़ रहा है
और मैं घुट रहा हूँ
घुटि हुई साँसों में एहसास है...

खुद को खोने का
कुछ मज़ा आज़माइशओं का
आँगन की ओखल में दिखते उस चाँद का
जो पास तो बहुत है
पर छूते ही बिखर जाता है पानी में

और एक एहसास है- कुछ काला सा
क्या वो मेरे ज़हन में छुपा डर है?
क्या वो मेरे कल का साया है?
या वो रगों में बहता लहू
जो उतना ही मुझमें,
जितना मैं उसमे


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