Friday, December 23, 2011

मैं


कभी सिरफिरे...जो इन आँखों पे बिखरे
ये सारे नदियाँ पहाड़
और उस पार...
कुछ उगते से सूरज की आग
कुछ उधार माँग लूँ इनसे
कुछ समा लूँ अपने अंदर
वो जो जलती रहे
और इतरा ऊँ मैं खुद पर
कि मैं आदमी हूँ
और उससे भी बढ़कर मैं हूँ...ये जाग सारा

कभी कभी उड़ता हूँ रातों
में जैसे चमगादड़ हूँ मैं
ज़रा ज़रा सा छूता
उन तारों की झिलमिल को
अपनी बटन तरह की आँखों से
जिनमें ना तो डर है
ना है रोष कहीं का
है कहीं पे खुदा किसी सा
किसी भेष सा किसी देश में
पर क्यूँ पाता हूँ मैं खुद में 
उसको जिसको कहते
की है उपर सबसे

बहती हुई नदी सा
कभी तेज़ पहाड़ों
कभी सुस्त मिट्टी में
उल्टा पुल्टा, सोता जगता
लेता जाता सभी किनारों
उन्हीं सहारों को...
जिनको कहते हैं साथी
उसी हसीं की कहीं कसक सी...
तड़प बिछड़ है

तो क्या?
फिर से कुछ नये नज़ारे रस्ते रस्ते
आते जाते पंख उठाए
इस दुनिया की ऊँची नीची
गलियों की छाहों से
कहीं छुपा सा कभी मिला सा
उस रेत के दानो में 
उन आँगन उन गाँवों से
सभी धूप सी कभी रेल सा
जहाँ दरख़्त की बाहों में सोया
नीलगगन सा आगे बढ़ता
वहीं कहीं रहता हूँ मैं
पर ढूँढों तो पास तुम्ही में

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